NEET पेपर में हुए धांधली का सच।

पिछले 4जून को पूरा देश जहां चुनावी राजनीति के परिणाम जानने में व्यस्त था। NTA ने नीट का परिणाम घोषित किया, जबकि परिणाम तो 14जून को आना था। जब परिणाम में अनियमितता के अनेकों मामले उजागर होने लगे। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया। कभी शिक्षामंत्री NTA को सर्टिफिकेट देते दिखे, तो कभी कुछ अनियमितता को स्वीकारा।

प्रश्न सिर्फ पेपर लीक का नहीं है। पिछले दस सालों में एससी से लेकर हर प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर में धांधली क्या सिर्फ धांधली भर है? ये एक सोची समझी रणनीति के तहत किया गया असंवैधानिक कार्य है। एक नीट पेपर को ही लें। सरकारी मेडिकल कॉलेज में कुल सीट का  53% लगभग सीट है। प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में देश की 80% आबादी फीस देने के स्थिति में नहीं है। जो 20% देश के लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं उनके लिए 47% मेडिकल में पहले ही सुरक्षित है। बचे 53% सीट जिसके लिए 80% आबादी संघर्ष करती है,वहां भी उन 20% वाले अपना वर्चस्व चाहते हैं। ऐसे में आप भारतीय जो सरकारी मेडिकल कॉलेज के फीस भरने की स्थिति में नहीं है उनके लिए मुख्यधारा में आने के क्या रास्ता बचा है? 
पेपर लीक आज के समय में एक बिजनेस मॉडल बन गया है। जिसके जड़ राजनीतिक दलों के आर्थिक प्रबंधन से जुड़ा है।

देश के आमजन को जहां धर्म,मजहब, जाति, में बांटकर मूल मुद्दे से ध्यान को भटकाया जा रहा है, ताकि मूल मुद्दे के तरफ ध्यान न जा पाए। कॉलेज, यूनिवर्सिटी, लोकसेवा आयोग जैसे महत्वपूर्ण पदों पर गुणवत्ता के आधार पर नहीं, व्यक्ति के राजनीतिक झुकाव को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे में एक स्वतंत्र चिंतन, अंतिम पायदान पर खड़े लोग देश के मुख्यधारा में कैसे आएंगे। ये मुद्दा ही नहीं रह गया है। बिहार आर्थिक अपराध यूनिट ने अभी तक जांच को बेहतर स्थिति में था। फिर क्या कारण है कि जांच सीबीआई को सौप दिया गया है। ये किसी को बचाने की पहल तो नहीं है।

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